महर्षि वाग्भट्ट द्वारा लिखित अष्टांगहृदय (संपूर्ण)
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जो मनुष्य दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की कामना करते हैं, उन्हें आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करना तथा उसके उपदेशों का पालन करना अत्यावश्यक है; क्योंकि आयु-सम्बन्धी सम्पूर्ण ज्ञान आयुर्वेद का विषय है। वर्तमान समय में आयुर्वेद पर अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं, उनमें से एक है- आचार्य वाग्भट रचित अष्टांगहृदय। आयुर्वेद आठ अंगों में विभाजित है। प्रत्येक अंग पर अनेक ग्रन्थ होते हुए भी सभी प्रकार की व्याधियों के उपचार के लिए किसी एक ग्रन्थ की असमर्थता को देखकर आचार्य वाग्भट ने सभी अंगों के साररूप अष्टांग-संग्रह की रचना की। अष्टांग-संग्रह ग्रन्थ की विशालता के कारण तथा अत्यन्त कठिनाई से समझ में आने वाला होने के कारण आचार्य वाग्भट ने अष्टांगहृदय की रचना की। शीघ्र ही अष्टांगहृदय सम्पूर्ण भारत में विख्यात हो गया। अष्टांगहृदय का भारतवर्ष की प्रायः सभी मुख्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस ग्रन्थ में छह स्थान हैं। इनमें पहला सूत्रस्थान तीस अध्यायों का है, यथा- आयुष्कामीय, दिनचर्या, ऋतुचर्या, रोगानुत्पादनीय, द्रव्यद्रव्य विज्ञानीय, अन्नस्वरूप-विज्ञानीय, अन्नरक्षा, मात्राशितीय, द्रव्यादि-विज्ञानीय, रसभेदीय, दोषादि-विज्ञानीय, दोषभेदीय, दोषोपक्रमणीय, द्विविधोपक्रमणीय, शोधनादि-संग्रह, स्नेहविधि, स्वेदविधि, वमनविरेचन-विधि, नस्यविधि, धूमपान विधि, गण्डूपादि विधि, आश्च्योतनांजन विधि, तर्पण-पुटपाक विधि, यन्त्रविधि, शस्त्रविधि, शल्याहण विधि, शिराव्यधविधि, शस्त्रकर्म विधि, क्षाराग्निकर्मविधि। सूत्रस्थान में आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्तों, स्वास्थ्य के सिद्धान्त, रोगों का प्रतिकार, आहार द्रव्यों तथा ओषधियों के गुण, शरीर-दोषों की प्रकृति तथा विकृति, विभिन्न प्रकार के रोग एवं उनकी चिकित्सा आदि विषयों का विवरण है। दूसरा शरीर स्थान छह अध्यायों का है, यथा- गर्भावक्रान्ति, गर्भव्यापद् विधि, अंगविभाग शरीर अध्याय, मर्मविभाग शरीर अध्याय, विकृतिविज्ञानीय और दूतादि-विज्ञानीय। शरीर से सम्बन्धित स्थान शरीर स्थान कहे जाते हैं। शरीर स्थान में गर्भविज्ञान, शरीर रचना, शरीर क्रिया, शरीर प्रकृति, मानस प्रकृति, मर्म शरीर, शुभएवं अशुभ स्वप्नों एवं लक्षणों का प्रादुर्भाव, अरिष्ट ज्ञान एवं आसन्न मृत्यु के लक्षण आदि विषयों का वर्णन किया गया है। तीसरे निदानस्थान के सोलह अध्याय सब रोगों से सम्बन्धित है- सर्वरोगनिदान, ज्वर निदान, रक्तपित्त-कास निदान, श्वास-हिक्का निदान, राजयक्ष्मा निदान, मदात्यय निदान, अर्शोनिदान, अतिसारग्रहणीदोष निदान, मूत्राघात निदान, प्रमेहनिदान, विद्रधिवृद्धि-गुल्मनिदान, उदरनिदान, पाण्डु-शोफ-विसर्प निदान, कुष्ठ-श्वित्र-कृमि निदान, वातव्याधिनिदान, वातशोणित निदान। निदान स्थान में प्रमुख रोगों का निदान, पूर्वरूप, रूप, सम्प्राप्ति एवं साध्यासाध्यता का विवरण दिया गया है। चिकित्सास्थान में बाइस अध्याय है, यथा- ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्तचिकित्सा, कासचिकित्सा, श्वास-हिक्काचिकित्सा, राजयक्ष्माचिकित्सा, छर्दि-हृद्रोग-तृष्णाचिकित्सा, मदात्ययचिकित्सा, अर्शचिकित्सा, अतिसारचिकित्सा, ग्रहणीदोषचिकित्सा, मूत्राघात चिकित्सा, प्रमेहचिकित्सा, विद्रधि-वृद्धिचिकित्सा, गुल्म-
Additional information
| Weight | 1750 g |
|---|---|
| Dimensions | 25 × 19 × 6 cm |
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