अथ सत्यार्थप्रकाश 1875
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आर्य समाज, वेद-प्रेमियों, शोधार्थियों एवं सत्य के जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रंथ अनिवार्य है।
यह पुस्तक श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मेरे व्यय से रची है और मेरे ही व्यय से यह मुद्रित हुई है। उक्त स्वामी जी ने इसका रचनाधिकार मुझको दे दिया है और उसका मैं अधिकारी हूँ। और मेरी ओर से इस पुस्तक की रजिस्ट्ररी कानून 20 सन 1869 ई० के अनुसार हुई है। इसलिए मेरे वा मेरे आश्रितों के इस पुस्तक के छापने का किसी को अधिकार नहीं है।
श्री राजा जयकृष्णदास बहादुर
सी० एस० आई०
Description
यह पुस्तक खरीदने से पहले हमसे संपर्क करें क्योकि यह संस्करण आपकी डिमांड पर छपवाया जाता है वह भी इस लिये की इस पुस्तक को आप जिजासा रूप से देखना या पढ़ना चाहते है और इसका प्रमाण रूप में दुरुपयोग नहीं करेंगे क्योकि महर्षि दयानंद ने इस संस्करण को खारीचकर नया द्वितीय संसकरण प्रकाशित कर दिया था नए व्यक्ति के लिए यह पढ़ना वर्जित है
अथ सत्यार्थप्रकाश महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की अमर कृति है, जो वैदिक धर्म, ईश्वर-तत्त्व, आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, समाज-सुधार तथा सत्य-असत्य के विवेक पर आधारित है।
यह ग्रंथ अंधविश्वास, पाखण्ड और अवैदिक मान्यताओं का तर्कपूर्ण खंडन करता है तथा वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानकर सत्य का प्रतिपादन करता है।
यह संस्करण मूल ऐतिहासिक संदर्भों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है, जिसमें 1875 ई०, बनारस में प्रकाशित प्रथम संस्करण की आत्मा सुरक्षित रखी गई है।
Additional information
| Weight | 750 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14 × 5 cm |
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