न्यायदर्शनम् (हिन्दीभाषान्तरसम्पन्नम्)
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न्यायदर्शनम् भारतीय दर्शन की षड्दर्शन परंपरा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और तर्कप्रधान दर्शन है।
यह ग्रंथ महर्षि गौतम द्वारा प्रणीत है, जिसमें—
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प्रमाण
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प्रमेय
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संशय
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प्रयोजन
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दृष्टान्त
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सिद्धान्त
आदि विषयों का तर्कसंगत विवेचन किया गया है।
यह संस्करण विशेष रूप से—
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हिन्दी भाषान्तर सहित
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टिप्पणी (व्याख्या) से समलंकृत
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शास्त्रीय क्रम में संपादित
है, जिससे दर्शन के जटिल सूत्र सरलता से समझ में आते हैं।
यह पुस्तक दर्शन, तर्कशास्त्र, संस्कृत तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के विद्यार्थियों और अध्येताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
Description
त्रिणि गूढात्मसूत्राणि गुह्यं गूढं चैव गौतमः।
न्यायशास्त्रमभिसृत्य वक्ष्ये किंचिद् यथामति॥
दर्शन की उपयोगिता
मनुष्य क्या है? कौन है? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है? यह संसार क्या है? इसकी सृष्टि कैसे होती है? इसका स्रष्टा कौन है? मनुष्य को कैसा जीवन बिताना चाहिए? ईश्वर तथा कर्म क्या है? इत्यादि अनेक विचार मानव को प्रारम्भ से ही, जब से भी उसमें विचार करने की शक्ति आयी है, द्विविध में डालते रहे हैं। तत्त्वदर्शियों के मत में मानव को इन विषयों का तत्त्वज्ञान हो सकता है। इसी को भारतीय तत्त्वदर्शी ‘सम्यग्दृष्टि’ या ‘दर्शन’ कहते हैं। सम्यग्दर्शन (तत्त्वज्ञान) होने पर कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डालते, परन्तु जिनको यह ‘सम्यग्दर्शन’ नहीं है वे भवबन्धन में ही फँसे रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘दर्शन’ उक्त सभी प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर देकर मानव को लक्ष्य तक पहुँचाता है।
भारतीय दर्शनों की विचारधारा व्यापक है। प्राचीन या आधुनिक, वैदिक या अवैदिक, आस्तिक या नास्तिक—सभी भारतीय तत्त्वदर्शी स्वपक्षस्थापन के समय परपक्ष पर अवश्य विचार करते आये हैं। इसी लिये सर्वदर्शनसंग्रहकार ने जहाँ वैदिक धर्मग्रन्थों तथा ईश्वरवादी भारतीय दर्शनों का संग्रह किया है वहाँ उन्होंने चार्वाक, जैन तथा बौद्ध दर्शनों का भी संग्रह किया है। यह बात दूसरी है कि स्वयं माधवाचार्य एक वैदिक दार्शनिक थे, अतः उन्होंने उक्त नास्तिक दर्शनों को सर्वप्रथम (पूर्वपक्ष के रूप में) ही रखा। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि भारतीय दार्शनिकों की विचारदृष्टि व्यापक तथा उदार रही है।
इसी व्यापक दृष्टि के कारण प्रत्येक भारतीय दर्शन की शाखा अपने आप में समृद्ध है। निदर्शन के रूप में, हम इस न्यायदर्शन को ही लें—इस न्यायदर्शन में चार्वाक, जैन, बौद्ध, सांख्य, मीमांसा, वैशेषिक तथा वेदान्त आदि सभी अन्य दर्शनों पर यथास्थान विचार किया गया है। यों, भारतीय दर्शनों में प्रत्येक दर्शन ज्ञान का एक स्वतंत्र कोश है। हम यह प्रतिपादित करते हैं कि जिस विस्तार को भारतीय दर्शनों का सम्यक् ज्ञान है, वह पाश्चात्य दर्शनों की जटिल प्रणाली को भी सुगमतया अवगाह कर सकता है।
दर्शनों का विभाजन
भारतीय दर्शनों का विभाजन करने से पूर्व हम यह मान लेते हैं कि सभी दर्शन ‘वेद’ तथा ‘ईश्वर’ को वेद मानकर चले हैं। इसी वृत्त के सहारे वे आस्तिक या नास्तिक तथा वैदिक या अवैदिक—दो स्थूल भागों में विभक्त हो गये। वेद को न माननेवाले दर्शन तीन हैं—
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चार्वाक,
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जैन, तथा
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बौद्ध।
इन तीनों को वेद का प्रामाण्य न मानने के कारण दार्शनिक लोग अवैदिक या वेदविरोधी संज्ञा से उद्धृत करते हैं। और वेदानुकूल दर्शनों में हम प्रधानतः इन दर्शनों को रखते हैं—
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मीमांसा,
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वेदान्त,
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सांख्य,
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योग,
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न्याय तथा
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वैशेषिक।
‘नास्तिक’ शब्द का अर्थ दो तरह से लिया जाता है—पहला प्रामाणिक अर्थ यह है कि ‘जो परलोक को न माने’। इस अर्थ के अनुसार चार्वाक दर्शन को छोड़कर अवशिष्ट सभी दर्शन ‘आस्तिक’ कहलाते हैं। परन्तु इस ‘नास्तिक’ का आज जो भी प्रचलित अर्थ है कि ‘जो ईश्वर को न माने’, इस अर्थ में वे सभी दर्शन ‘नास्तिक’ हैं जो अवैदिक हैं। तथा आस्तिक दर्शनों में साधारणतः हम उनको गिनना करते हैं जिनके वेदवचन को वे प्रमाण मानते हैं।
वेदानुकूल दर्शनों में यदि दो स्थूल भेद करें तो ये वेदवचन को ही एकान्ततः प्रमाण मानते हैं और जो वेदों के साथ-साथ लौकिक विचारों (युक्तियों) को भी उतना ही महत्व देते हैं। इसमें प्रथम कोटि में मीमांसा तथा वेदान्त दर्शन का स्थान है; क्योंकि मीमांसा वेद के कर्मकाण्ड पर आधारित है तथा वेदान्त उसके ज्ञानकाण्ड उपनिषदों पर। दूसरी विचारकोटि के दर्शन हैं—न्याय, वैशेषिक, सांख्य तथा योग। ये वेदवचन के साथ-साथ तर्क को भी उतना ही महत्व देते हैं। इनमें भी न्यायदर्शन तो तर्क का सर्वोच्च आधार लिये हुए है। यह अपनी छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी बात बिना तर्क के कहना-सुनना चाहता ही नहीं। इसी लिये इसका एक दूसरा नाम ‘तर्कशास्त्र’ भी है।
‘आस्तिक’ को प्रमाण मानने के आधार से भी दर्शनों के दो भेद हैं—एक वे जो सृष्टि के मूल कारण, ईश्वर की सत्ता या स्वरूप, आत्मा की सत्ता या स्वरूप आदि विषयों पर विचार करते समय आप्तवचन को सर्वाधिक महत्व देते हैं, जैसे—मीमांसा, वेदान्त आदि वैदिक दर्शन तथा जैन, बौद्ध आदि अवैदिक दर्शन। जैसे मीमांसा या वेदान्त दर्शन श्रुतिवाक्यों को ‘आप्तवचन’ के रूप में प्रयुक्त करते हैं उसी तरह बौद्ध दार्शनिक भगवान बुद्ध को सर्वज्ञ मानते हुए उनके वचनों को आप्तवचन के रूप में प्रयुक्त करते हैं। जैनदर्शन भी अपने तीर्थंकरों की सर्वज्ञता स्वीकार कर उनके वचन प्रमाणस्वरूप उपस्थित करता है। परन्तु न्याय तथा वैशेषिक दर्शनों के लिये यह सब कुछ मान्य नहीं हो सकता; ये दर्शन श्रुति को ‘आप्तवचन’ तो मानते हैं, किन्तु उसी से सब कुछ मान कर उसी के सहारे अपनी बात पर आग्रह नहीं करते, अपितु अपनी बात को तार्किक युक्तियों के आधार पर रखते हैं, और तार्किक युक्तियों के साथ-साथ श्रुतिवचनों को भी प्रमाणरूप से उपस्थित करते हैं। यह एक बड़ा भेद है।
न्यायशास्त्र नाम क्यों?
यह न्यायदर्शन ‘प्रमाण’ पर सर्वाधिक बल देता है; क्योंकि प्रत्यक्ष, परोक्ष पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ निर्णय कर सकने का साधन एकमात्र वही है। यद्यपि यह बात कही जा सकती है कि योगियों को प्रत्यक्ष तथा परोक्ष सभी तरह का ज्ञान होता रहता है, परन्तु योगिज्ञान भी तरतम-भेद के कारण वह सब के लिये सर्वथा प्रमाण नहीं हो सकता। अतः पूर्ण योगी की बात ‘आप्तवचन’ में ही सम्मिलित मानी जायेगी। जब कि हम कह चुके हैं कि यह दर्शन ‘आप्तवचन’ को ही एकान्ततः प्रमाण नहीं मानता, अपितु साधारण जन को बोधगम्य बनाने के लिये, कोई भी बात प्रमाण के आधार पर करता है। प्रमाणों में यह दर्शन ‘अनुमान प्रमाण’ को अधिक महत्व देता है; क्योंकि आध्यात्मिक विषय (जो कि इस दर्शन के लक्ष्य हैं) अनुमानमात्र से अधिकतर प्रतिपाद्य होते हैं।
अनुमान प्रमाण की प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय तथा निगमन—इन पाँच अवयवों की प्रक्रिया न्यायशास्त्र में ऐसी खरी उतरती है कि अप्रमाद के बाद सभी दार्शनिक इसी को स्वीकार करते आये हैं।
Additional information
| Weight | 600 g |
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| Dimensions | 22 × 14 × 3 cm |
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