चारों वेदों का भाष्य (Vol. 1–25) – एक प्रामाणिक संकलन
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आपके हाथों में यह जो चारों वेदों का भाष्य (Vol. 1–25) – एक प्रामाणिक संकलन आया है, वह केवल एक ग्रंथ-संग्रह नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान, प्राचीन ऋषि-परम्परा और सत्य-धर्म की अविरल धारा का वाहक है। वेदों का अध्ययन सरल कार्य नहीं; यह मन, बुद्धि और आत्मा—तीनों का समन्वित साधन है। वेदों के प्रत्येक मंत्र में अनन्त अर्थ, गहन विज्ञान और जीवन-निर्देशक तत्त्व छिपे हैं। इनका मर्म तभी उद्घाटित होता है जब पाठक श्रद्धा, एकाग्रता और तर्कशक्ति—तीनों को साथ लेकर आगे बढ़ते हैं।
इस ग्रंथ के चारों भाष्यकारों—स्वामी दयानन्द सरस्वती, आर्य मुनि जी, स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक तथा प्रो. विश्वनाथ विद्यालंकार—ने वेदों के सागर से अमृत निकालकर आपके लिए सहज, स्पष्ट और विवेचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। अब यह आपकी साधना और जिज्ञासा पर निर्भर करता है कि आप इस अमृत का कितना पान करते हैं।
Description
वेद मानव-संस्कृति के आदि-स्रोत, ज्ञान, विज्ञान, नीति और आध्यात्मिक प्रकाश के शाश्वत भंडार हैं। चारों वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—भारतीय वाङ्मय के मूलाधार हैं, जिनमें मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष हेतु मार्गदर्शन उपलब्ध होता है। वेदों का स्वाध्याय केवल शब्दार्थ या मन्त्र-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि उनके अंतर्निहित तात्त्विक, वैज्ञानिक और नैतिक संदेश को समझना ही वास्तविक वेद-अध्ययन है।
इसी महान उद्देश्य को सामने रखते हुए प्रस्तुत ‘चारों वेदों का भाष्य (Vol. 1–25) – एक प्रामाणिक संकलन’ तैयार किया गया है। यह संग्रह वेदभाष्य की उस परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसने वेदोक्त ज्ञान को सरल, तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक और सर्वमान्य रूप में प्रस्तुत कर समाज को शुद्ध विचार और सत्य-धर्म का मार्ग दिखाया।
इस महाग्रंथ के प्रमुख चार भाष्यकारों—
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स्वामी दयानन्द सरस्वती,
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आर्य मुनि जी,
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स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक,
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प्रो. विश्वनाथ विद्यालंकार,
—ने अपने-अपने युग में वेदों के प्रत्येक मन्त्र का शाब्दिक, व्याकरणिक, निरुक्तीय, दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन करके वेद-जिज्ञासुओं को अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया है।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेदों की मूल भावना को पुनर्जीवित करते हुए स्पष्ट किया कि वेद सर्वमानव-हितकारी हैं तथा सत्य का सर्वोच्च प्रमाण हैं। आर्य मुनि जी ने दयानन्दीय भाष्य परंपरा को और अधिक दृष्टिगोचर एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया। स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक ने वेद-मीमांसा को सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक रूप प्रदान किया, वहीं प्रो. विश्वनाथ विद्यालंकार ने विद्वत्तापूर्ण दृष्टि से वेदों की अवधारणाओं को सरल एवं आधुनिक संदर्भों से जोड़कर समझाया।
इस संपूर्ण 25-खंडीय सेट में चारों वेदों के मंत्रों का व्याकरणिक परीक्षण, निरुक्तीय विश्लेषण, तात्त्विक अर्थ, यज्ञ-विज्ञान, दार्शनिक विमर्श तथा नैतिक-आचार-सूत्रों का विस्तृत अध्ययन सम्मिलित है। यह ग्रंथ न केवल वेद-विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और संस्कृत-विद्वानों के लिए अनुपम निधि है, बल्कि उन सभी सत्य-प्रेमियों के लिए भी उपयोगी है जो जीवन को धर्म, ज्ञान और विवेक के प्रकाश में समझना चाहते हैं।
हमें विश्वास है कि यह प्रामाणिक संकलन वेद-परम्परा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा तथा पाठकों को सत्य, ज्ञान और धर्म की ओर प्रेरित करेगा।
Additional information
| Weight | 25000 g |
|---|---|
| Dimensions | 30 × 30 × 30 cm |
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