सांख्य दर्शन का इतिहास
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इसमें सन्देह नहीं कि भारतीय दर्शनों में सांख्यदर्शन का महत्त्व अद्वितीय है। न केवल अपनी अत्यन्त प्राचीनता के कारण ही, न केवल भारतीय वाङ्मय और विचारधारा पर अपने विस्तृत और अमिट प्रभाव के कारण ही, किन्तु वास्तविक अर्थों में किसी भी दार्शनिक प्रस्थान के लिये आवश्यक गहरी आध्या-त्मिक दृष्टि के कारण भी इसका महत्त्व स्पष्ट है। ‘सांख्य’ शब्द के वैदिक संहिताओं में न आने पर भी, सांख्य की विचारधारा का मूल वेदों के “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” (ऋ० १।१६४।२०) जैसे मन्त्रों में स्पष्ट दिखाई देता है।
सांख्य के प्रवर्तक भगवान् कपिल के लिए “ऋषि प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानविर्भात” [श्वे० उ० ५०२] जैसा वर्णन स्पष्टतः उस दर्शन की अति-प्राचीनता को सिद्ध करता है। इसीप्रकार ‘अर्थशास्त्र’ में न्याय, वैशेषिक आदि दर्शनों का उल्लेख न करके “सांख्यं योगो लोकायतं चेत्यान्वीक्षिकी” (१।२) यहाँ सांख्य के वर्णन से उसकी आपेक्षिक प्राचीनता ही सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त, कुछ उपनिषदों के साथ २, समस्त पुराण, धर्मशास्त्र, महाभारत, आयुर्वेद आदि के विस्तृत साहित्य में सांख्य का जितना गहरा प्रभाव दिखलाई देता है उतना और किसी दर्शन का नहीं। अन्त में यह भी ध्यान में रखने की बात है कि –
Additional information
| Weight | 950 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14 × 4 cm |
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