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शिक्षा-शास्त्रम्

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यह ग्रंथ महर्षि पाणिनि द्वारा विरचित शिक्षा-शास्त्र पर आधारित है, जिसमें वर्ण-उच्चारण, ध्वनि-उत्पत्ति, स्वर-स्थान, उच्चार-यन्त्र तथा वेद-पाठ की शुद्धता के सभी तत्त्वों का वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक विवेचन है। वेदों के सस्वर-पाठ, मंत्रोच्चार एवं संस्कृत-भाषा की ध्वनिविज्ञान संबंधी मूलभूत शिक्षा-ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करने वाला प्रमुख ग्रंथ है। This text provides scientific and practical knowledge of Sanskrit phonetics and articulation, serving as a vital guide for correct Vedic chanting, pronunciation techniques, and sound production based on the principles of Maharshi Panini’s Shiksha tradition.

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Description

आचार्य यास्क ने वैदिक वाङ्मय के प्रवृत्ति-क्रम का निर्देश करते हुए कहा है- आरम्भ में पदार्थों के धर्मों का साक्षात्कार करनेवाले ऋषि हुए। उन्होंने अवर काल में उत्पन्न होनेवाले ऋषियों को उपदेश द्वारा मन्त्रों का सम्पदान किया। उसके पश्चात् उपदेश मात्र से न समझने के कारण कालान्तर ॥ ऋषियों ने विभागपूर्वक वेद-वेदाङ्गों का प्रणयन किया (निरुक्त १.४)। बदामों में सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण वेदाङ्ग है- शिक्षा। इसका उल्लेख एण्डकोपनिषद्, तैत्तिरीयोपनिषद् तथा गोपथब्राह्मण आदि ग्रन्थों में हुआ है। पाचीन काल में वेदाङ्ग शिक्षा के स्वरूप का अनुमान वर्त्तमान में उपलब्ध आपिशली शिक्षा और काशिका-न्यास-पदमञ्जरी आदि ग्रन्थों में उपलब्ध होनेवाले शिक्षा-विषयक सूत्रों से होता है। आरम्भ में सम्भवतः प्रातिशाख्यों मेंही ‘शिक्षा’ का अन्तर्भाव रहता था। अर्वाचीन काल में जब पाणिनीय व्याकरण ही ‘सर्ववेदपारिषद’ (महाभाष्य २.१.५८) माना जाने लगा, स्यात् उसी काल में कहा गया था- ‘व्याकरणं नामेयमुत्तरा विद्या, सोऽसौ 10ब्द शास्त्रेष्वभिविनीत उपलब्ध्याधिगन्तुमुत्सहते’ (महाभाष्य १.२.३२) । २००दः शास्त्र का अर्थ है – प्रातिशाख्य अर्थात् वर्णोच्चारण आदि का उपदेशक ।
शास्त्र वर्तमान काल में दो प्रकार के शिक्षा ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं- प्रथम, मनात्मक – जैसे आपिशली शिक्षा, पाणिनीय शिक्षा; दूसरे, श्लोकात्मक- जैरी याज्ञवल्क्य शिक्षा, पाणिनीय ‘अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि’ शिक्षा । विद्वानों के सूक्ष्म विवेचन से स्पष्ट होता है कि जिन शिक्षा-ग्रन्थों की रचना मुख्यतः “नात्मक है, एके-अन्ये आदि शब्दों द्वारा परमत उद्धृत किये जाते हैं तथा ‘भवन्ति चात्र’ कहकर श्लोकों का संग्रह भी होता है, वे प्राचीन हैं। जो शिक्षा ग्रन्थ प्रधानतः श्लोकात्मक हैं, स्वरादि विशिष्ट विषय का भी प्रतिपादन करते हैं, वे अर्वाचीन हैं। इस कसौटी पर परखने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मुत्रात्मक पाणिनीय शिक्षा प्राचीन है और श्लोकात्मक पाणिनीय शिक्षा अर्वाचीन है। परन्तु यह भी तथ्य है कि पिछली कई शताब्दियों से वेदाङ्ग शिक्षा के रूप में श्लोकात्मक पाणिनीय शिक्षा ही प्रचलित रही है, वैदिक आताणों में इसकी परम्परा लुप्त हो चुकी थी।

Additional information

Weight 500 g
Dimensions 22 × 14 × 3 cm

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