त्रैतसिद्धान्तादर्शः
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यह ग्रंथ वेदों में प्रतिपादित ‘त्रैत सिद्धान्त’ अर्थात् ईश्वर–जीव–प्रकृति के सनातन संबंधों का तात्त्विक एवं व्यवहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वैदिक आचार-विचार का शास्त्रीय आधार, धर्म का वास्तविक उद्देश्य तथा यज्ञादि अनुष्ठानों के माध्यम से मानव-जीवन की उन्नति को सुगमता से समझाया गया है। शोधार्थियों, अध्यापकों एवं धर्म-अनुयायियों के लिए यह अत्यंत मार्गदर्शक व उपयोगी ग्रंथ है। This text presents the philosophical doctrine of Tri-unity — God, Soul and Nature — rooted in Vedic wisdom, elucidating the practical relevance of rituals and dharmic living for spiritual upliftment. A highly useful guide for researchers and sincere practitioners of Sanatana Dharma.
Description
त्रैतसिद्धान्तादर्श पण्डित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ आर्यसमाज के आरम्भिक युग के प्रौढ़ विद्वान् एवं शास्त्रार्थ-महारथी विद्वान् थे। उन्होंने जिस प्रकार के प्रौढ़ सैद्धान्तिक ग्रन्थों की रचना की, उनका जोड़ मिलना कठिन है । प्रकृत ‘चैतसिद्धान्तादर्श’ भी उनके गम्भीर पाण्डित्य एवं विस्तृत अध्ययन का परिचायक है। इस ग्रन्थ के संज्ञादर्श प्रकरण में विद्वान् लेखक ने भारतीय दर्शन शास्त्रों में प्रयुक्त होने वाली सैकड़ों संज्ञाओं तथा पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या प्रस्तुत की है। एकविध-द्विविधत्रिविध आदि के क्रम से षोडशविध तक अनेक भेद-प्रभेदपूर्वक पारिभाषिक शब्दों का विवरण प्रस्तुत करना पण्डित जी के बहुश्रुत ज्ञान को व्यक्त करता है। आरम्भ में इन संज्ञाओं का निरूपण होने के कारण आगे आने वाले शास्त्रीय विवेचन को समझना सरल हो जाता है। मध्यकाल के दार्शनिक व्याख्याकारों ने व्याख्येय ग्रन्थ के -अधिकारी – विषय – प्रयोजन सम्बन्ध – इन चार अनुबन्धों पर अवश्य विचार किया है।
Additional information
| Weight | 600 g |
|---|---|
| Dimensions | 23 × 15 × 3 cm |
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